फिर भी

समझदारी चुप रहने में है

प्रस्तुत पंक्तियों में कवियत्री दुनियां को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि समझदारी चुप रहने में ही होती है क्योंकि सबका करा इस दुनियां में सबके सामने आता ही आता है इसलिए बदले की भावना त्याग कर चुप रहना सीखो क्योंकि ऐसा ज़रूरी नहीं की इस दुनियां में हर इंसान को ही आपके विचार पसंद आये इसलिए मासूमियत का हाथ थामो अपने को नवजात शिशु जैसा सुरीला बनाओ क्योंकि आप केवल खुदको ही बदल सकते हो इसलिए पहले खुद बदलो फिर तुम्हे देख ये जग भी बदलेगा.

अब आप इस कविता का आनंद ले…

समझदारी चुप रहने में है,
किसीसे ज़्यादा कुछ ना कहने में है.
क्योंकि कहने से बात बिगड़ जाती है.
गलत बात के रहते रिश्तो की डोर उलझ जाती है.
किसीको अपने ही किये गलत कार्यो की चोट दिल ही दिल में सताती है.
तो किसी की समझ में ये छोटी सी बात भी नहीं आती है.
तुम्हारे ही किये कर्मो की छवी,
जीवन के हर पड़ाव में तुम्हारे सामने आती है.
मासूम लोगो की मासूमियत ही,
उन्हें जीवन की हर पड़ाव में बचाती है.
सादगी से भरा जीवन ही,
लोगो की ज़िन्दगी को सजाता है.
मेहनत ही राह में पाई चोट को देख,
इस दुनियाँ को बड़ा मज़ा आता है।
फिर उसी को सफल बनता देख,
उसी की बातो का सच सबको समझ में आता है।

धन्यवाद।

Exit mobile version